koi maazi ke jharokon se sadaa deta hai | कोई माज़ी के झरोकों से सदा देता है

  - Ahmad Rahi

कोई माज़ी के झरोकों से सदा देता है
सर्द पड़ते हुए शोलों को हवा देता है

दिल-ए-अफ़सुर्दा का हर गोशा छनक उठता है
ज़ेहन जब यादों की ज़ंजीर हिला देता है

हाल-ए-दिल कितना ही इंसान छुपाए यारो
हाल-ए-दिल उस का तो चेहरा ही बता देता है

किसी बिछड़े हुए खोए हुए हमदम का ख़याल
कितने सोए हुए जज़्बों को जगा देता है

एक लम्हा भी गुज़र सकता न हो जिस के बग़ैर
कोई उस शख़्स को किस तरह भुला देता है

वक़्त के साथ गुज़र जाता है हर इक सदमा
वक़्त हर ज़ख़्म को हर ग़म को मिटा देता है

  - Ahmad Rahi

Aadmi Shayari

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