"हम मिले थे ख़्वाबों में"

तेरे जाने से असर मुझ पे हुआ कुछ भी नहीं
साथ जो ख़ुद से था ख़ुद का मिरा वो छूट गया
मेरे अंदर जो चटकता रहा हर रोज़ कहीं
शख़्स इस बार तिरे हिज्र में वो टूट गया
हम तरसते रहे पीने को झलक तेरी वहीं
और कोई ग़ैर समुंदर को मिरे लूट गया
क्या बताएँ दिल-ए-बेताब की हालत का सबब
याद को तेरी जुदा होने नहीं देता है
कल शब-ए-ग़म को टटोला तो ये मालूम पड़ा
बस तिरा रंज है जो सोने नहीं देता है
इक तिरा प्यार है और मेरा तजुर्बा जो मुझे
अब किसी और का भी होने नहीं देता है
मुश्किलें बढ़के भी आसान लगीं हैं मुझ को
मुश्किलें देख ये हलकान लगीं हैं मुझ को
खोल देतीं हैं सभी भेद मिरे सामने ये
सब परेशानी परेशान लगीं हैं मुझ को
जिन को दिखता था जहाँ सारा मिरी आँखों में
आज वो आँखें भी वीरान लगीं हैं मुझ को
कब तलक बोझ उठाऊँ मुझे आज़ाद करो
ज़िंदगानी भी यूँ सामान लगीं हैं मुझ को
खेल ही हश्र का मैदान है मेरे नज़दीक
जाने हर शख़्स क्यूँ हैरान है मेरे नज़दीक
जिस को देखो तो मोहब्बत में बदन का तालिब
हर तरफ़ हुस्न परेशान है मेरे नज़दीक
गर बिछड़ना है मुकद्दर मिरा तुझ से तो सही
सोच लेंगे के सभी गुल खिले थे ख़्वाबों में
मेरी हर याद को तुम दिल से भुला भी देना
सोच लेंगे के हमें तुम मिले थे ख़्वाबों में

— Faiz Ahmad

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