दिल-ए-ग़रीब को तो शायरी पसंद नहीं
मिरे नसीब को तो शायरी पसंद नहीं
मैं किस तरह से कहूँँ अपने दिल की बात भला
मिरे हबीब को तो शायरी पसंद नहीं
तुम्हारी कैसे बनेगी भला रकी़ब के साथ
मिरे रकी़ब को तो शायरी पसंद नहीं
है कोई मुझको दवा दे सुख़न के बदले में
मिरे तबीब को तो शायरी पसंद नहीं
मुझे बताओ कोई और तौर-ए-इस्तग़फार
उस अल-मुजीब को तो शायरी पसंद नहीं
हमें पसंद न करती तो सब्र आ जाता
पर उस अजीब को तो शायरी पसंद नहीं
तुम्हारा हुस्न वजह है जो करता हूँँ वरना
मुझे मुहीब को तो शायरी पसंद नहीं
ऐ मौला कैसे करेंगे ये हक अदा अपना
तिरे ख़तीब को तो शायरी पसंद नहीं
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