ये ठीक है कि बहुत वहशतें भी ठीक नहीं

मगर हमारी ज़रा आदतें भी ठीक नहीं

अगर मिलो तो खुले दिल के साथ हम से मिलो
कि रस्मी रस्मी सी ये चाहतें भी ठीक नहीं

तअल्लुक़ात में गहराइयाँ तो अच्छी हैं
किसी से इतनी मगर क़ुर्बतें भी ठीक नहीं

दिल ओ दिमाग़ से घाइल हैं तेरे हिज्र-नसीब
शिकस्ता दर भी हैं उन की छतें भी ठीक नहीं

क़लम उठा के चलो हाल-ए-दिल ही लिख डालो
कि रात दिन की बहुत फ़ुर्क़तें भी ठीक नहीं

तुम 'ए'तिबार' परेशाँ भी इन दिनों हो बहुत
दिखाई पड़ता है कुछ सोहबतें भी ठीक नहीं

— Aitbar Sajid

More by Aitbar Sajid

Other ghazal from the same pen

See all from Aitbar Sajid →

Terrorism Shayari

Shers of terrorism.

All Terrorism Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling