तिरी रहमतों के दयार में तिरे बादलों को पता नहीं

अभी आग सर्द हुई नहीं अभी इक अलाव जला नहीं

मिरी बज़्म-ए-दिल तो उजड़ चुकी मिरा फ़र्श-ए-जाँ तो सिमट चुका
सभी जा चुके मिरे हम-नशीं मगर एक शख़्स गया नहीं

दर-ओ-बाम सब ने सजा लिए सभी रौशनी में नहा लिए
मिरी उँगलियाँ भी झुलस गईं मगर इक चराग़ जला नहीं

ग़म-ए-ज़िंदगी तिरी राह में शब-ए-आरज़ू तिरी चाह में
जो उजड़ गया वो बसा नहीं जो बिछड़ गया वो मिला नहीं

जो दिल-ओ-नज़र का सुरूर था मिरे पास रह के भी दूर था
वही एक गुलाब उमीद का मिरी शाख़-ए-जाँ पे खिला नहीं

पस-ए-कारवाँ सर-ए-रहगुज़र मैं शिकस्ता-पा हूँ तो इस लिए
कि क़दम तो सब से मिला लिए मिरा दिल किसी से मिला नहीं

मिरा हम-सफ़र जो अजीब है तो अजीब-तर हूँ मैं आप भी
मुझे मंज़िलों की ख़बर नहीं उसे रास्तों का पता नहीं

— Aitbar Sajid

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