"मोहब्बत क्या है"
ये काली आँखें
ये काले बाल
ये सुर्ख़ लाल लब
और ये गेहुँआ रंग
तुझ
में कुछ ऐसे ये जँचता है
जैसे बरसात के बा'द सूरज लगता है
जैसे ख़ुदा की मेहर सी
जैसे किसी दुश्मन के क़हर सी
जैसे सर्द मौसम में सुब्ह की सहर सी
जैसे दिवाली की रात हो
जैसे मेहँदी वाले हाथ हो
जैसे चाँदनी रात हो
जैसे तुझ संग नदी किनारे बैठे हो
लगता है जैसे मैं धरा हूँ और
मुझ में मीलों बहुत दूर तक
बेझिझक सी बे-धड़क सी
मौसम की बदमाशियों से बेपरवाह सी
मुझ
में रहती एक नहर सी हो
मैं तुझ को देखता रहता हूँ
अकेले भी संग तुझे पाता हूँ
वक़्त बे-वक़्त तुझ से कहता रहता हूँ
बदन के नक़्शे पर क़सीदे पढ़ता रहता हूँ
फूल ख़ुशबू माँगता है तुझ से
पानी ने चमकना सीखा है तुझ से
लगता है ये श्रृष्टि बस तुझ से ही है
तुझ से बस इतना कह पाता हूँ
सब लगता तुझ सा ही है
धरा और अंबर के बीच जितनी जगह है
बस एक चीज़ है जस की तस है
वो मोहब्बत जो तुझ से होती है
मोहब्बत जो तुझ से शुरू तुझ पर ही ख़त्म















