तब्अ इशरत-पसंद रखता हूँ
इक दिल-ए-दर्दमंद रखता हूँ
बहुत कहता नहीं मैं पस्ती को
अपनी फ़ितरत बुलंद रखता हूँ
चश्म-ए-बातिन से देखता हूँ मैं
चश्म-ए-ज़ाहिर को बंद रखता हूँ
— Akhtar Ansari
इक दिल-ए-दर्दमंद रखता हूँ
बहुत कहता नहीं मैं पस्ती को
अपनी फ़ितरत बुलंद रखता हूँ
चश्म-ए-बातिन से देखता हूँ मैं
चश्म-ए-ज़ाहिर को बंद रखता हूँ
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