तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साए में रात ठहरी है

कि रंग-ओ-नूर लिए काएनात ठहरी है

न अब जुनूँ की तमन्ना न है ख़िरद की तलब
ये किस मक़ाम पे आ कर हयात ठहरी है

न पूछ कैसे गुज़ारी है ज़िंदगी हम ने
क़दम क़दम पे अलमनाक रात ठहरी है

जहाँ में जब भी नज़र को कहीं सुकूँ न मिला
उम्मीद-दगाह-ए-नज़र तेरी ज़ात ठहरी है

बंधे हैं पेट पे पत्थर मगर ये शान तिरी
जहाँ भी तू ने कहा काएनात ठहरी है

तिरे तुफ़ैल में ये भी जहाँ ने देखा है
कई बरस के लिए एक रात ठहरी है

न जाने कौन सी हम से ख़ता हुई 'अख़्तर'
हमारे क़त्ल की हर सम्त बात ठहरी है

— Akhtar Gwaliori

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