जुर्म की तरह मोहब्बत को छुपा रक्खा हैहम गुनहगार नहीं हैं ये बताएँ किस कोरूठ जाते तो मनाना कोई दुश्वार न थावो तअ'ल्लुक़ ही न रक्खें तो मनाएँ किस को— Akhtar Saeed Khan