छुपे हुए हैं सर-ए-राह सौ ख़तर ख़ामोश
चले चलो मेरे यारान-ए-हम-सफ़र ख़ामोश
फ़ज़ा-ए-क़र्या तिलिस्म-ए-सुकूत में गुम-सुम
सियाह रात के दामन में बाम-ओ-दर ख़ामोश
हमारे बा'द अगर रुस्तख़ेज़ हो भी तो क्या
बिसात-ए-वक़्त से हम तो गए गुज़र ख़ामोश
ब-ईं नवाज़िश-ए-मौसम शगुफ़्त-ए-गुल पे न जा
ज़बान-ए-हाल से गोया ब-चश्म-ए-तर ख़ामोश
जो अर्श-ए-जाह सितारा-शिकार थे उन को
फ़लक की आँख ने देखा फ़गंदा-सर ख़ामोश
हर एक दौर में गूँजी है ज़रबत-ए-फ़रहाद
कभी भी रह न सके साहब-ए-हुनर ख़ामोश
ज़बाँ-दराज़ 'ज़ियाई' को रोकिए साहब
ये मस्लहत का तक़ाज़ा है अल-हज़र ख़ामोश
— Akhtar Ziai















