'उम्र की कमसिन घड़ी में
लग गया दिल बे-दिली में
तीन बारी कुल मिले हैं
चार दिन की ज़िंदगी में
साथ रोना रो न पाए
बिछड़े इतनी हड़बड़ी में
देखनी है लज्जा तुझको
देख उसकी ओढ़नी में
दोस्त कहता था तुझे मैं
तू भी बदला आख़िरी में
दिन गुज़ारा तीरगी में
रात काटी रौशनी में
सच कहूँ तो बाद तेरे
मन नहीं है शायरी में
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