मेरे दिल में जाग रहा है फिर से दर्द पुराना सा
बिन पूछे ही घर कर बैठा बंदा इक अनजाना सा
मेरे वतन की मिट्टी की ही ख़ुशबू आती है उस सेे
लगता है वो शख़्स न जाने क्यूँँ जाना पहचाना सा
कल तक तो था सब कुछ मेरा तेरे विदा हो जाने से
अपने घर के आँगन में ही लगता हूँ बेगाना सा
बचपन उसका क्यूँँ छीनूं क्यूँँ रोकूँ शरारत करने से
मेरे अंदर भी है बालक मैं भी हूँ बचकाना सा
ले चल मुझको उन गलियों में जी लूँ मैं फिर से वो पल
बड़े दिनों के बाद मिले हैं छेड़ वही अफ़साना सा
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Ambar
our suggestion based on Ambar
As you were reading Gulshan Shayari Shayari