"पैग़ाम"
जब भी ये बाद-ए-सबा छू के गुज़रती है मुझे
जाने क्यूँ लगता है कि तुम ने पैग़ाम भेजा है
आज तक भागता रहता हूँ सदाओं के पीछे
के तू कहीं मिल जाएगी भावनाओं के पीछे
चश्म-तर हुए बैठे हैं रंगीन घटाओं के पीछे
जाने कैसा उभरता दर्द तू ने मेरे नाम भेजा है
जब भी ये बाद-ए-सबा छू के गुज़रती है मुझे
जाने क्यूँ लगता है कि तुम ने पैग़ाम भेजा है
— Ambar















