इस सोच में ही मेरी हर रात ढल रही है
बदले हैं लोग या फिर दुनिया बदल रही है
पानी की धार पर ये मुझ को लगा कि जैसे
इक सद
में से नदी ये बाहर निकल रही है
मैं कैसे साथ सबके अपने क़दम मिलाऊँ
दुनिया मिरी समझ से कुछ तेज़ चल रही है
वो छाते ही अँधेरा लगता है याद आने
ये देखो शाम भी अब जल्दी से ढल रही है
— Amit Kumar















