कुछ इस लिए उस में मिरा मन लगता है
वो ऐसा क़ातिल है जो सज्जन लगता है
दीवारें आ जाती हैं भाई भाई में
अब थोड़ी घर का घर से आँगन लगता है
नाख़ून इतने प्यारे हैं उस के कि वो
जो घाव भी कर दे तो चंदन लगता है
जितना जले मज़बूत उतना होगा ये
जीवन किसी मिट्टी का बर्तन लगता है
— Amit Kumar















