लबों पे जो है वो ख़ामोशियाँ कुछ और कहती हैं
मगर आँखों की ये वीरानियाँ कुछ और कहती हैं
सहर की धूप भी अब एक आशा सी जगाती है
मगर शब भर की ये तारीकियाँ कुछ और कहती हैं
किताबों में लिखीं बातें जो गर सच्चाई बतलाएँ
तो क्यूँ दुनिया की ये चालाकियाँ कुछ और कहती हैं
सजाते हैं जो वो महफ़िल हमें पहचानने को भी
हमारी तर्ज़ की तन्हाइयाँ कुछ और कहती हैं
— amit kumar gangle















