मुझ से निकल के मेरे किसी आईने में आ

ऐ रब्ब ए खुश-जमाल कभी राब्ते में आ

तुझ से गुज़र के अपनी ख़बर लेनी है मुझे
दीवारें जिस्म ओ जान मेरे रास्ते में आ

यक बारगी जो फिर गई नजरें तो फिर गई
अब चाहे ख़्वाब में कि किसी रतजगे में आ

सब तोड़ ताड़ तुझ से कड़ी जोड़ लूंगा मैं
इक बार मेरे पास किसी सिलसिले में आ

हल हो गया ना मुझ में हमेशा के वास्ते
किस ने कहा था तुझ से कि मुझ मसअले में आ

रक्खें तुझे हथेली पर कब तक सँभाल कर
चल अश्क ए ना-मुराद निकल आबले में आ

फिर देखता हूँ कैसे निकलते है तेरे बल
'अम्मार' इस बदन से निकल कर खुले में आ

— Ammar Iqbal

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