barham hui hain nazren mujhse jo meherbaan ki | बरहम हुई हैं नज़रें मुझ सेे जो मेहरबाँ की

  - Aniket sagar

बरहम हुई हैं नज़रें मुझ सेे जो मेहरबाँ की
हालत ख़राब कर दी है मेरे आशियाँ की

वो माहताब इक दिन बेशक चमक उठेगा
फिर रौशनी खिलेगी ज़र्रों में कहकशाँ की

क्या देखकर न जानें लगने लगा उसे डर
नींदें उड़ी हुई हैं क्यूँ आज पासबाँ की

करते नशा जो बच्चें बढ़ते नहीं है आगे
ऐसे में ख़त्म होगी पीढ़ी ये नौजवाँ की

पहचानता मुझे दिल के राज़ जानता हो
मुझको तलाश है इक ऐसे ही राज़दाँ की

मुझको संभाले रख्खा बचपन से फ़ूल जैसा
आतीं मुझे अभी तक है याद बागबाँ की

आनंद हौसलों की सागर लहर उठा दे
उत्साह से ज़मीं भी महकेगी दो-जहाँ की

  - Aniket sagar

Justaju Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Aniket sagar

As you were reading Shayari by Aniket sagar

Similar Writers

our suggestion based on Aniket sagar

Similar Moods

As you were reading Justaju Shayari Shayari