जिस सेे डर कर गए ख़ुद-कुशी की तरफ़

लौट आए उसी ज़िंदगी की तरफ़

बे-वजह क्यूँ मेरे दिल तू धकधक करे
इक नज़र दर पे और इक घड़ी की तरफ़

दो दिलों को मुहब्बत से वीरान कर
मोड़ देते हैं इक अजनबी की तरफ़

सरसरी बात कोई मैं करती नहीं
ग़ौर कीजे मिरी हर कही की तरफ़

तकते हैं ग़म मिरी ओर उम्मीद से
बाहें फैलाऊँ कैसे ख़ुशी की तरफ़

ऐ मुसाफ़िर खड़ा किस का रस्ता तके
कोई आता नहीं इस गली की तरफ़

ज़िंदगी है कि रुकती नहीं और 'सहर'
कोई रस्ता नहीं वापसी की तरफ़

— Anjali Sahar

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