दो चार पल का है ये ग़म-ए-तीरगी सहर
लाई है अपने साथ सदा रौशनी सहर
जज़्बात दूसरों के समझता है कौन अब
है अपनी अपनी सबकी ग़मी और ख़ुशी सहर
दौर-ए-ग़म-ए-फ़िराक़ भी दुख है कोई भला
देखी नहीं है तुम ने अभी बेबसी सहर
मंज़िल अगर क़रीब है तो छू के देखिए
पानी है या सराब कोई 'अंजली सहर'
— Anjali Sahar















