जो शख़्स करता रहा बरसों इक मकाँ रौशन

न जाने कर रहा है कौन सा जहाँ रौशन

है इन दियों का मुक़द्दर भी बेटियों जैसा
कहाँ बनाए गए और हुए कहाँ रौशन

हमारी ओर तो होती है अब बहार उदास
तुम्हारे होने से तो होगी वाँ ख़िज़ाँ रौशन

कि इन ग़मों से निकलना बहुत कठिन भी नहीं
दिल-ओ-दिमाग़ रहे बस रवाँ दवाँ रौशन

बिछड़ते वक़्त थी माँ बाप के लबों पे दुआ
ख़ुदा रखे तुझे बिटिया सदा वहाँ रौशन

यही बनेंगी तुम्हारे भी डूबने का सबब
जो शक्ल से नज़र आती हैं कश्तियाँ रौशन

सुख़नवरों में गिना जाएगा तुझे भी सहर
ख़ुदा बनाए रखे तेरा ये गुमाँ रौशन

— Anjali Sahar

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Gulshan Shayari

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