kaun hai jisko yahaañ par bebaasi achchhii lagii | कौन है जिसको यहाँ पर बेबसी अच्छी लगी

  - Ansar Ethvi

कौन है जिसको यहाँ पर बेबसी अच्छी लगी
ज़िंदगी में कब किसी को तीरगी अच्छी लगी

जब भी होती है किसी को बे-वजह सी ये घुटन
फिर कहाँ किसको भला ये ज़िन्दगी अच्छी लगी

मैं थका हारा हुआ था फिर जा बैठा छाँव में
फिर दरख़्तों की मुझे बस ख़ामुशी अच्छी लगी

जिस तरह गंदुम की रोटी से यूँँ मन भरता नहीं
इस तरह मुझको मिरी माँ की हँसी अच्छी लगी

जब से हमने भी सुनी है दास्तान-ए-कर्बला
तब से हमको बस हमारी तिश्नगी अच्छी लगी

  - Ansar Ethvi

Khushi Shayari

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