हवा के हम-नशीं हाथों में अपने हाथ मलते हैंचराग़ों की अगर ज़िद हो हवाओं में ही जलते हैंबहादुर तो नहीं डरते किसी ऐसे मुख़ालिफ़ सेबहुत से फूल ऐसे हैं जो काँटों में ही पलते हैं— Ansar Eatvi