हर बड़ी मछली से हम तो इस तरह से डर गए
हम ने तालाबों को छोड़ा फिर नए से घर गए
जो नए से रास्ते थे मुश्किलों से थे भरे
पाँव कितनों के गए कितनों के उस
में सर गए
देर कर दी जिन में हम ने सर तलक वो आ गए
हड़बड़ी में काम सारे हम गलत वो कर गए
साँस का आना हुआ फिर साँस का जाना हुआ
हमको नामालूम हम ज़िन्दा हैं या फिर मर गए
अब नहीं सुनते हैं वो भी दूसरों की बात को
ज़ख़्म जितने भी थे उनके अब जो सारे भर गए
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by anupam shah
our suggestion based on anupam shah
As you were reading Baaten Shayari Shayari