har ba | हर बड़ी मछली से हम तो इस तरह से डर गए

  - anupam shah

हर बड़ी मछली से हम तो इस तरह से डर गए
हम ने तालाबों को छोड़ा फिर नए से घर गए

जो नए से रास्ते थे मुश्किलों से थे भरे
पाँव कितनों के गए कितनों के उस
में सर गए

देर कर दी जिन में हम ने सर तलक वो आ गए
हड़बड़ी में काम सारे हम गलत वो कर गए

साँस का आना हुआ फिर साँस का जाना हुआ
हमको नामालूम हम ज़िन्दा हैं या फिर मर गए

अब नहीं सुनते हैं वो भी दूसरों की बात को
ज़ख़्म जितने भी थे उनके अब जो सारे भर गए

  - anupam shah

Baaten Shayari

Our suggestion based on your choice

More by anupam shah

As you were reading Shayari by anupam shah

Similar Writers

our suggestion based on anupam shah

Similar Moods

As you were reading Baaten Shayari Shayari