शोर की जब ये आदत हमें हो गई
बज़्म तन्हा हमें कर के ख़ुद सो गई
सब सेे मिलता रहा नाम लेकर तेरा
ये ख़ता मुझ सेे सौ मर्तबा हो गई
टूटकर के मैं सच को दिखाता रहा
आइनो सी मेरी ज़िन्दगी हो गई
उसकी इक मुस्कुराहट को तड़पे बहुत
वो ख़फ़ा जब हुई आप ही रो गई
एक तितली जो थी फूल पर बस फ़िदा
उड़ गईं खुशबुएँ बेवफ़ा हो गई
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