दीवारों पे सर धुनता हूँ
बिन तेरे कितना तन्हा हूँ
ऐसे तो पागल हूँ फिर भी
पागल होने से डरता हूँ
ज़ख़्म नया ले लेता हूँ मैं
पिछला कुछ ऐसे भरता हूँ
— anupam shah
बिन तेरे कितना तन्हा हूँ
ऐसे तो पागल हूँ फिर भी
पागल होने से डरता हूँ
ज़ख़्म नया ले लेता हूँ मैं
पिछला कुछ ऐसे भरता हूँ
Other ghazal from the same pen
Shers of aashiq.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling