तुम्हें सोच कर के मैं यूँँ खिल रहा हूँ
कि करवट बदल कर तुम्हें मिल रहा हूँ
वो जिस पर से लौटे हैं सारे मुसाफ़िर
मैं ऐसे ही दरिया का साहिल रहा हूँ
बहुत वक़्त बीता समझने में ये भी
मैं आसाँ रहा हूँ या मुश्किल रहा हूँ
मुझे छोड़ने का गुमाँ यूँ न करना
न जाने मैं कितनों की मंज़िल रहा हूँ
— anupam shah















