"वो एक ख़्वाब था"
वो एक ख़्वाब था जो अब मुझे नहीं आता
और कोई शख़्श इन आँखों को अब नहीं भाता
न जाने क्यूँ ही हौसलों को हम सँभाले हैं
ये जबकि जानते हैं दूर अब उजाले हैं
उसे न चाह थी पर इश्क़ कर लिया हम ने
चराग़ को हवा की सम्त रख दिया हम ने
किसी दरख़्त के साए में मिला था मुझ को
मुझे उलझाए हुए ख़ुद में मिला था मुझ को
गले से लग के मेरी रूह को राहत दी थी
उदास चेहरे को अपनी हथेलियाँ दी थी
मेरे माथे की सलवटों को चूम कर उस ने
जो न क़िस्मत में लिखी थीं मुझे ख़ुशियाँ दी थीं
ख़ुशी के आँसुओं में उस को डूबते देखा
मैं ने उस रोज़ यूँ सूरज को डूबते देखा
चाँद का रंग फिर घुला था शफ़क़ में ऐसे
मेरा रंग उस के रंग में हो घुल गया जैसे
शादमानी सी हरारत हुई कोई दिल में
कोई तितली-सी बदन में मेरे उड़ी जैसे
मुझे यूँ भी लगा ये वक़्त ठहर जाए कहीं
या तो मर जाऊँ या मैं उस का ही हो जाऊँ अभी
रात उस रात के तो बा'द भी बहुत आईं
ढूँढ़ता था मगर आहट तेरी नहीं पाई
ये बात और है क़िस्मत बदल नहीं सकती
मैं चाहे जितना चाह लूँ तू मिल नहीं सकती
ख़फ़ा रहो मगर मेरे सामने तो आओ तुम
न कुछ कहो अगर तो आँख तो दिखाओ तुम
मैं जानता हूँ मैं ने दर्द दिया है तुम को
किसी तरह से मेरे दर्द को मिटाओ तुम
हथेलियों में मेरी सब्र की लकीर न थी
तुझे मिल पाऊँ मैं ऐसी भी तो तक़दीर न थी
उसी शिद्दत से ही मैं अब भी चाहता हूँ तुम्हें
न हो यक़ीन अगर इंतिज़ार देख मेरा
फिरूँ मैं दर-ब-दर कि अब कहाँ को जाऊँ मैं
एक मुश्ताक़ था बेज़ार न हो जाऊँ मैं
थी ये तलब कि तुझ पे जाँ निसार कर दूँ मैं
और अब यूँ है कि तैयार न हो जाऊँ कहीं















