mujh se hi mujh ko ab to milaata nahin koi | मुझ से ही मुझ को अब तो मिलाता नहीं कोई

  - Anwar Taban

मुझ से ही मुझ को अब तो मिलाता नहीं कोई
इक आइना भी मुझ को दिखाता नहीं कोई

क्या जाने क्या हुए वो शराफ़त पसंद लोग
अब ख़ैरियत भी उन की बताता नहीं कोई

इस ख़ौफ़ में कि ख़ुद न भटक जाएँ राह में
भटके हुओं को राह दिखाता नहीं कोई

सच्चाइयों के रास्ते सुनसान हो गए
भूले से भी यहाँ नज़र आता नहीं कोई

हस्सास हैं जो आप तो चेहरे पढ़ा करें
ज़ख़्मों को अपने आप दिखाता नहीं कोई

नाकामियों की सेज पे बैठा हूँ इस लिए
'ताबाँ' यहाँ से मुझ को उठाता नहीं कोई

  - Anwar Taban

Aaina Shayari

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