aaj maghoom kyun ho ai taabaan | आज मग़्मूम क्यूँ हो ऐ 'ताबाँ'

  - Anwar Taban

आज मग़्मूम क्यूँ हो ऐ 'ताबाँ'
कुछ तो बोलो कि माजरा क्या है

  - Anwar Taban

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    इलाही ख़ैर हो अब अपने आशियाने की
    निगाहें उस की तरफ़ फिर उठीं ज़माने की

    हवा-ए-तुंद गुज़र जाए सर-निगूँ हो कर
    इक ऐसा आशियाँ कोशिश करो बनाने की

    ख़िज़ाँ के आने से हो जाएँ ग़म-ज़दा जो फूल
    उन्हें क़सम है बहारों में मुस्कुराने की

    किसी की बर्क़-ए-नज़र से न बिजलियों से जले
    कुछ इस तरह की हो ता'मीर आशियाने की

    वो पूछते हैं कि दिन किस तरह गुज़रते हैं
    ये कोई बात है 'ताबाँ' उन्हें बताने की
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    Anwar Taban
    समझ से काम जो लेता हर एक बशर 'ताबाँ'
    न हाहा-कार ही मचते न घर जला करते
    Anwar Taban
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    तू उस निगाह से पी वक़्त-ए-मय-कशी 'ताबाँ'
    की जिस निगाह पे क़ुर्बान पारसाई हो
    Anwar Taban
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    प्यार का इक पल सुकून-ए-ज़िंदगी दे जाएगा
    ख़त्म जो होने न पाए वो ख़ुशी दे जाएगा

    वो ख़ुलूस-ओ-मेहर का पैकर बनाम-ए-दोस्तां
    दुश्मनों को भी शुऊर-ए-दोस्ती दे जाएगा

    हुस्न-ए-फ़ितरत जल्वा-गर हो कर यक़ीनन इक दिन
    रंग कलियों को गुलों को दिलकशी दे जाएगा

    आएगा वो दिन हमारी ज़िंदगी में भी ज़रूर
    जो अंधेरों को मिटा कर रौशनी दे जाएगा
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    Anwar Taban
    हँसते हँसते निकल पड़े आँसू
    रोते रोते कभी हँसी आई
    Anwar Taban
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