अपनी बातों से मिरी रूह में हलचल कर दो
मुझ को ख़्वाबों की सदाओं में मुकम्मल कर दो
आरज़ू बन के जो ठहरी है मिरी पलकों पर
उस तसव्वुर को दुआ मान के क़ाबिल कर दो
दर्द में डूब के बेजान पड़ा रहता हूँ
अपनी साँसों से मिरी साँस भी क़ामिल कर दो
आप की बात में शबनम सी नमी मिलती है
इक ग़ज़ल कह के मिरी बात भी शामिल कर दो
वो जो रिश्तों में जमी राख है उड़ती कब है
बन के तूफ़ान जमी राख को ओझल कर दो
इश्क़ की शर्त है ये सब्र का ज़िंदा रहना
सब्र इतना न कराओ कि मुसज्ज़ल कर दो
तुम अगर छू लो तो हर ज़ख़्म भी भर जाएगा
इक दफ़ा छू के ज़रा ज़ख़्म को मुबतल कर दो
तुम जो चाहो तो मैं ख़ुद को भी बदल लूँ जानाँ
आज 'अर्जुन' की मोहब्बत को मुसलसल कर दो















