उस को मिले सुकूँ न मिरे इंतिक़ाल से
मरना मुहाल हो न सका इस ख़याल से
मैं ने तो फ़ैसला भी किया मैं जुदा रहूँ
पर हाथ छूटता न था उस के जमाल से
काग़ज़ पे बस मेरे ही तसव्वुर के फूल थे
अब हर कली खिली है ख़याल-ए-रिसाल से
ख़ामोशियाँ भी अब तो बग़ावत सी कर रहीं
पर लब थके हैं उस के अनेकों सवाल से
आसान सा लगा था उसे भूलना मुझे
बेहाल हो गया हूँ इसी इब्तिहाल से
कुछ बंदिशें जो इश्क़ की पहले लुभा गईं
अब थक गया हूँ उस की इसी देख-भाल से
उस का फ़रेब था वो मोहब्बत के नाम पे
क्या हाल हो गया है मेरा इस मलाल से
ईमान बेचकर वो मुझे लूटता रहा
बस हारता रहा हूँ मैं उस की ही चाल से
शाइ'र बना तो ग़म को तिजारत बना लिया
अब गीत बेचता है वो मेरी मिसाल से
दीवार आज बैठ के रोने लगी है संग
घर में दिखे न कोई जो हो हम-ख़याल से
अर्जुन तो हँस रहा है कि महफ़िल में बेवजह
आँखें छिपा रही हैं सितम किस कमाल से















