स्केच
याद है
डाइरी के उस पन्ने पर
तुम ने बस यूँ ही
एक स्केच खींचा था
न रंग था
न नाम
बस एक फूल सा
कुछ अधखिला कुछ ख़ामोश
मैं ने वो पन्ना
काग़ज़ की तहों में
यूँ रख लिया
जैसे कोई रख दे
गुलाब पुराने ख़तों में
वक़्त गुज़रा
तुम दूर हुईं
मगर वो फूल
आज भी वहीं है
सालों से वैसा ही
न मुरझाया
न बेजान हुआ
अब जब बारिश होती है
पन्ना भीगता है
और वो फूल
खिलकर महक उठता है
ठीक तुम्हारी तरह
— Arman Habib















