ज़रा सी बात पे आँसू बहाए जाते हैं
हुज़ूर फ़ित्ना-ए-महशर उठाए जाते हैं
हवा की ओट में हम थरथराए जाते हैं
कुछ इस तरह वो निगाहों में आए जाते हैं
हया का पीर समझते हैं लोग तो उनको,
हमें ख़बर है वो क्या गुल खिलाए जाते हैं
दिलों में आग लगी है जो वो नहीं बुझती
बदन से सिर्फ़ हवस ही बुझाए जाते हैं
सियाह रात के दामन में रोशनी के लिए
चराग़ हम भी लहू से जलाए जाते हैं
मुझे ये डर है कोई उँगलियाँ न कर दे क़लम
वो हाथ सबसे मुसलसल मिलाए जाते हैं
कहीं कहीं तो खुशामद प भी नहीं जाते
कहीं कहीं तो मियाँ बिन बुलाए जाते हैं
ख़ुदा करे कि सलामत रहें मिरे दुश्मन
जो मेरी राह में कांटे बिछाए जाते हैं
वो मयक़दा हो हरम या सनम का दरवाज़ा
जिधर भी जाए कदम डगमगाए जाते हैं
तलाश और करें तीन कांधे ए साहिल
वफ़ा की लाश जो तन्हा उठाए जाते हैं
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