suno tum qabr par meri faqat gum-naam likh dena | सुनो तुम क़ब्र पर मेरी, फ़क़त गुम-नाम लिख देना

  - A R Sahil "Aleeg"

सुनो तुम क़ब्र पर मेरी, फ़क़त गुम-नाम लिख देना
मुहब्बत में शिकस्ता अज़्म था नाकाम लिख देना

यहाँ जीना भी मुश्किल है यहाँ मरना भी है मुुश्किल
फ़क़त इतना सा ही है 'इश्क़ का अंजाम लिख देना

कोई शिकवा नहीं कोई शिकायत भी नहीं उससे
जफ़ा हो या सितम सब 'इश्क़ का इन'आम लिख देना

है ये अंतिम ग़ज़ल मेरी निभाना अब है वादे को
है उसके नाम मेरा आख़िरी पैग़ाम लिख देना

सताएगी कभी जो याद तेरी ज़ीस्त को तो सुन
क़लम अब मैं उठाऊँगा न, अहद-ए-आम लिख देना

मेरी जो याद आए गुनगुना लेना ग़ज़ल मेरी
दुआ में याद करना और फिर बदनाम लिख देना

अगर पूछे मेरी मसरूफ़ियत कोई कभी तुम से
था शाइर और ग़ज़ल-गोई था मेरा काम लिख देना

पता आसान है और सहल है पा लेना भी मुझको
फ़क़त गूगल पे तुम "ए. आर. साहिल" नाम लिख देना

  - A R Sahil "Aleeg"

Jafa Shayari

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