मसअला ये नहीं है कि वो बेवफ़ा हो गया
बावफ़ा एक मासूम दिल कर्बला हो गया
तेरी इस बे-वफ़ाई का कैसे करूँँ मैं दिफ़ा
हर कोई पूछता है ये सब कैसे क्या हो गया
दी सजा 'इश्क़ ने 'इश्क़ को 'इश्क़ करने की ये
ऐन भी शीन भी क़ाफ़ भी सब जुदा हो गया
एतिबार-ए-वफ़ा का किया क़त्ल फिर हुस्न ने
'इश्क़ में आज फिर से कोई दिलजला हो गया
रूठे रूठे से बैठे हो क्यूँँ फेर कर हम से मुँह
तुम हमें कुछ बताओगे भी आज क्या हो गया
ज़ब्त के बाद भी आ गया उस पे कम्बख़्त दिल
जान-ओ-जी का मेरे ये भी दुश्मन नया हो गया
जिसकी ज़ाहिर थी बदमाशियाँ हर गली-मोड़ पर
कैसे मानूँ मैं ये बात वो देवता हो गया
दौर-ए-हाज़िर में दौलत ही है हर किसी का ख़ुदा
कोई अपना नहीं आज ये तज्रिबा हो गया
हिज्र का ग़म नहीं मुझ को अफ़सोस बस इतना है
दिल मेरा तोड़ कर ग़म में ख़ुद मुब्तिला हो गया
बन गई है वो दुल्हन किसी और की आज से
'इश्क़ का ख़त्म 'साहिल' हर इक सिलसिला हो गया
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