
जी में आता है अब इस रिश्ते को कुछ नाम न दूँ
मर भी जाऊँ तो तुझ को मौत का पैग़ाम न दूँ
मुझ को जन्नत से निकलवाने में है हाथ तेरा
और तू फिरती है कहे तुझ को मैं इल्ज़ाम न दूँ
— A R Sahil "Aleeg"
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