किसी के हाथ की रेखा में लिख तक़दीर आती है
किसी के पैर में पाज़ेब बन ज़ंजीर आती है
कि जब सोने को जाता हूँ नहीं होता है कुछ लेकिन
मैं जब बिस्तर से उठता हूँ तेरी तस्वीर आती है
नदी झरनों या फुटपाथों की अब मुझ को नहीं यादें
मैं जब शमशीर छूता हूँ तेरी तासीर आती है
ये दुनिया भी अजब क़िस्सों के मानी चाहती है अब
किसी राँझा के हिस्से में किसी की हीर आती है
— Aryan Mishra















