अब और दम न घुटे रौशनी का कमरे में

दरीचे वा हों उजालों की दौड़ पूरी हो

जो ख़्वाब आएँ तो देखूँ तुझे मैं जी-भर के
कि नींद आए तो ख़्वाबों की दौड़ पूरी हो

कोई बढ़ाए ज़रा आसमान की वुसअ'त
मैं चाहता हूँ परिंदों की दौड़ पूरी हो

किसी अज़ाब से रुक जाए रक़्स क़ातिल का
घरों को लौटते बच्चों की दौड़ पूरी हो

मैं तेरे हिज्र के आलम में जी नहीं सकता
सो अब यही हो कि साँसों की दौड़ पूरी हो

— Ashu Mishra

More by Ashu Mishra

Other ghazal from the same pen

See all from Ashu Mishra →

Hijr Shayari Collection

Shers of hijr shayari collection.

All Hijr Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling