चाहे घर में रोक दे या रहगुज़र में रोक दे
वो जिसे चाहे उसे आधे सफ़र में रोक दे
नाख़ुदा उस जल-परी के पास पहुँचा दे मुझे
या तो उस कश्ती को ले जा कर भँवर में रोक दे
ये अगर बाहर गईं तो ख़ामुशी छा जाएगी
मेरी आवाज़ें मिरे दीवार-ओ-दर में रोक दे
चंद क़दमों पर बदल जाते हैं मेरे हम-सफ़र
ऐ ख़ुदा कोई नज़ारा तो नज़र में रोक दे
उस की आमद से मकान-ए-दिल बहुत शादाब है
और कुछ दिन इस नए मेहमाँ को घर में रोक दे
— Ashu Mishra















