दिल-ए-उलफ़्त निभाना चाहता हूँ
सुनहरी शाम लाना चाहता हूँ
मिरी ख़्वाहिश को सुन के हँस पड़ोगी
मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
ये किस ने मुल्क की दीवार खींची
मैं सब को साथ लाना चाहता हूँ
भला ये कौन दुश्मन बन गया है
उसे दुनिया दिखाना चाहता हूँ
वफ़ादारी कोई करता हो जिस
में
वही गुज़रा ज़माना चाहता हूँ
— ABHISHEK RANJAN















