"बा-वफ़ा से बे-वफ़ा होने तक"

दिलों का खेल खेला है किसी ने
उसे रोता हुआ देखा किसी ने

तुम्हें कैसे कहूँ मैं दिल नहीं है
इसे पत्थर बनाया है किसी ने

अभी जाओ चले जाओ इधर से
अभी दिल को मिलाना है किसी से

अभी मेरा समय आया नहीं है
मुझे एक बात कहनी है किसी से

तुम्हीं ने पीठ में ख़ंजर है मारा
तुम्हारा रंग देखा है किसी ने

क़सम है वापसी करना नहीं तुम
वो अच्छा है मगर लड़ना नहीं तुम

मैं तन्हा हूँ मगर ख़ुश हूँ अभी मैं
मिटा के फ़ासले आना नहीं तुम

लगी हल्दी किसी के नाम का था
लगी मेहँदी किसी के नाम का था

बताओ भूल सकते हो ना मुझ को
वो वा'दा टूट जाएगा ना कल से

जो हम ने साथ में ली थी जो उस दिन
तुम्हीं ने हाथ में धागे थे बाँधे
क़सम अब तक निभाता आ रहा हूँ
तभी ख़ुद को मिटाता जा रहा हूँ

दबी आवाज़ में रुख़सत हुई वो
उसी ने दर्द लिखना है सिखाया
मुझे छोड़ा मुझे बदनाम कर के
मुझे 'रंजन' बनाया है किसी ने

— ABHISHEK RANJAN

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