हुजूम-ए-आश्ना के दरमियाँ तन्हा रहा हूँ
हद-ए-अफ़सुर्दगी से इस क़दर गुज़रा हुआ हूँ
मैं जिस लड़की को हर क़ीमत पे पाना चाहता था
ख़ुदा जाने मैं अब उस से भी क्यूँ उकता चुका हूँ
उसी के जिस्म की ख़्वाहिश में उस को खो दिया है
अब अपने दिल में ही जलता हुआ पछता रहा हूँ
रिफ़ाक़त दोस्ती क़ुर्बत मोहब्बत और उल्फ़त
मैं रफ़्ता-रफ़्ता इन सदमों से बाहर आ रहा हूँ
तुम्हारी याद तो साया ही बन बैठी है मेरा
ये मेरे साथ ही है मैं जिधर भी जा रहा हूँ
जिसे मतलब नहीं मालूम 'जस्सर' तिश्नगी का
न जाने क्यूँ मैं उस के वास्ते दरिया बना हूँ
— Avtar Singh Jasser














