सारी रात के बिखरे हुए शीराज़े पर रक्खी हैं

प्यार की झूटी उम्मीदें ख़म्याज़े पर रक्खी हैं

कोई तो अपना वा'दा ही आसानी से भूल गया
और किसी की दो आँखें दरवाज़े पर रक्खी हैं

उस के ख़्वाब हक़ीक़त हैं उस की ज़ात मुकम्मल है
और हमारी सब ख़ुशियाँ अंदाज़े पर रक्खी हैं

— Azm Shakri

More by Azm Shakri

Other ghazal from the same pen

See all from Azm Shakri →

Neend Shayari

Shers of neend.

All Neend Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling