"हसरत-ए-वस्ल"

ये तेरा और मेरा मिलना सब को खल जाए
तू मिलना ऐसे कि हर कोई मुझ से जल जाए

तू मुझ को रख ले अगर मिलने आऊॅं तेरे घर
फिर आब-ओ-दाना मेरा तेरे घर से चल जाए

तुझी से मिलने के ख़ातिर सॅंवर रही हूँ मैं
ये पहली बार है तो थोड़ा डर रही हूँ मैं

दुपट्टा बाँधने वाली ने रक्खा है पल्लू
ये देख तेरे लिए क्या क्या कर रही हूँ मैं

मेरी पसंद की इक बात तुझ से कहनी थी
सो तेरे शहर में तेरी पसंद पहनी है

मैं चाहती हूँ ये पल मुझ को याद रह जाए
तो हाथ थाम के कह दूँ जो बात कहनी है

तू मेरे दिल पे तेरे इश्क़ का नक़ाब लगा
मैं लुट भी जाने को राज़ी हूँ तू हिसाब लगा

पसंद है मुझे बस तेरे हाथ से सब कुछ
मैं चाहती हूँ तू इन बालों में गुलाब लगा

— Bhuwan Singh

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