सुनाया न कीजे अलम बेबसी का
ये दुनिया समझती नहीं ग़म किसी का
अगर दुख पढ़ा जाता चेहरों से फिर तो
न होता कोई हादसा ख़ुद-कुशी का
अगर साँसें दी है तो क़िस्मत भी देता
बता क्या करूँ मैं अब इस ज़िन्दगी का
बुरा वक़्त जब ठीक होता नहीं है
तो क्या फ़ाएदा फिर ये महँगी घड़ी का
वो हँसमुख सा बच्चा बड़ा जब हुआ फिर
न जाने किया क्या वो अपने हँसी का
नक़ाबों के भीतर का चेहरा दिखाया
ये एहसान है मुझ पे इस मुफ़्लिसी का
बड़े घर से रिश्ते मिरे आ रहे हैं
ग़ज़ब फ़ाएदा है मियाँ नौकरी का
ये पैसों ने बाँधी है रिश्तों की डोरी
वगरना नहीं आदमी आदमी का
— Deenbandhu Jaiswal















