ज़बाँ औऱ ख़ंजर समझने लगे हैं

कि चेहरों में अंतर समझने लगे हैं

हमें जब से आँखों से धोखा मिला है
इशारे बराबर समझने लगे हैं

नहीं देना नालों को तरजीह इतना
ये ख़ुद को समुंदर समझने लगे हैं

नए नाव को थोड़ा समझाइएगा
किनारों को ठोकर समझने लगे हैं

न मम्मी की लोरी न दादी के क़िस्से
मकानों को क्यूँ घर समझने लगे हैं

ग़रीबी ने हम को तो समझाया यूँ है
समझते नहीं पर समझने लगे हैं

कहानी सुनाई है अपनी ज़रा क्या
हमें लोग शाइ'र समझने लगे हैं

— Deenbandhu Jaiswal

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