आप को अक्सर खड़े होकर किनारे देखते हैं
डूबते जाते हैं तिनकों के सहारे देखते हैं
देखते हैं देखने वाले न जाने आप में क्या
हम हमारी क़त्ल के मौज़ूँ इशारे देखते हैं
हो भला गुस्ताख़ कैसे अस्मत-ए-मरियम में कोई
चाँद है लुकता हिजाबों से सितारे देखते हैं
— Dhiraj Singh 'Tahammul'















