कभी भी इश्क़ में ये सानेहा नहीं देखा
वफा-ए-इश्क़ में मिलता सिला नहीं देखा
तुम्हारे बा'द किसी से कभी बनी ही नहीं
तुम्हारे बा'द कभी आइना नहीं देखा
शब-ए-फिराक़ दी थी तोड़ हर घड़ी मैं ने
के फिर कभी किसी का रास्ता नहीं देखा
मैं चाहता ही नहीं था के ये जी भर जाए
सो चाह कर भी उसे बारहा नहीं देखा
वो जिन के घर में सलामत है दोनों, मांँ औ' बाप
वो झूठ बोलते हैं के ख़ुदा नहीं देखा
उसे गले किसी से मिलते देख कर के भी
उसे यही मुझे कहना पड़ा नहीं देखा
उन्हें पता दो हमारा तुम्हें जो कहते हैं
के यार हमनें कभी दिलजला नहीं देखा
— Dipendra Singh 'Raaz'















