कुछ दिनों तक उस के दिल में मैं रहा ऊंँची जगह

और फिर उस ने याद करवा दी मुझे मेरी जगह

मेरा दामन भी कभी तन्हाई ने छोड़ा नहीं
हर सफ़र में मैं ने भी तन्हाई की रक्खी जगह

आज इक डर सा लगा उस से गले लगने के बा'द
वो गले मिलता था जब बचती न थी इतनी जगह

सोचने के ज़ाविए हैं मुख़्तलिफ़ दोनों के तो
क्यूँ कहें रख कर के देखो ख़ुद को तुम मेरी जगह

दिल के रस्ते में पड़ा है इश्क़ का टूटा दरख़्त
आ नहीं पाया है अब तक कोई भी तेरी जगह

जब उसे पूछा के "मैं या वो" तो फिर उस ने कहा
यार वो अपनी जगह है और तुम अपनी जगह

— Dipendra Singh 'Raaz'

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